य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥19॥
Translation (HI)
जो इसे (आत्मा को) मारने वाला समझता है और जो इसे मारा गया मानता है, दोनों ही अज्ञानी हैं। आत्मा न मारता है न मारा जाता है।
Life Lesson (HI)
आत्मा जन्म और मृत्यु से परे है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण भगवद गीता में आत्मा के अद्वितीय स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जो व्यक्ति आत्मा को मारने वाला समझता है और जो आत्मा को मारा गया मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। यहाँ उन्होंने बताया है कि आत्मा न तो किसी को मारता है और न ही किसी द्वारा मारा जाता है। आत्मा अनन्त, अविनाशी और अज्ञान के परे है।
इस श्लोक का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें आत्मा की अस्तित्व और अद्वितीयता को समझना चाहिए। आत्मा शरीर से अलग है, इसलिए यह न तो किसी को मार सकता है और न ही किसी द्वारा मारा जा सकता है। हमें अपनी सच्ची स्वरूप को समझकर जीवन को संयमित और साधनायुक्त बनाना चाहिए। यह श्लोक हमें आत्मा के महत्व को समझाता है और हमें उसकी अविनाशिता और अमरत्व का अनुभव करने के लिए प्रेरित करता है।