न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥20॥
Translation (HI)
आत्मा न तो जन्म लेता है और न मरता है; न यह कभी उत्पन्न हुआ है, न होगा। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और प्राचीन है, और शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
Life Lesson (HI)
आत्मा अनादि और अविनाशी है; मृत्यु केवल शरीर की है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण आत्मा के अविनाशित्व का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि आत्मा को न तो जन्म मिलता है और न मरण। यह न कभी उत्पन्न हुआ है, और न होगा। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और प्राचीन है, इसलिए शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा का नष्ट नहीं होता।
इस भावार्थ में यह समझने की बात है कि हमारी आत्मा अनंत स्वरूपी है जो केवल शरीर की मृत्यु के साथ नहीं विलीन होती। इससे हमें यह ज्ञान मिलता है कि हमारी आत्मा नि:शंका अमर है और इस अमरता का अनुभव करने के लिए हमें अपने शरीर के परिचय से परे उचित ध्यान और अध्ययन की आवश्यकता है।