यदि कोई आत्मा को नित्य अजन्मा या नित्य मरा हुआ माने, फिर भी, हे महाबाहो! तुझे उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।
Life Lesson (HI)
चाहे जैसी भी दृष्टि हो, आत्मा के लिए शोक व्यर्थ है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि आत्मा नित्य है, वह न तो जन्मता है और न मरता है। इसका अर्थ है कि आत्मा अनादि और अनंत है, इसलिए उसे न तो जन्म और मृत्यु का कोई संबंध होता है। इसके बावजूद, अगर कोई व्यक्ति आत्मा को नित्य जन्मा हुआ या नित्य मरा हुआ समझता है, तो भी उसे उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।
इस श्लोक का सरल संदेश यह है कि हमें आत्मा की अनन्तता और अविनाशिता को समझना चाहिए, जिससे हमें जीवन के उतार-चढ़ाव में स्थिरता और शांति मिले। चाहे हम आत्मा को अजन्मा या अविनाशी मानें, शोक उसके लिए व्यर्थ है क्योंकि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। इसलिए हमें अपने आत्मा के अटलता और नित्यत्व पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उसे समझने का प्रयास करना चाहिए।