अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥28॥
Translation (HI)
सभी जीव आरंभ में अव्यक्त थे, मध्य में व्यक्त होते हैं और अंत में फिर अव्यक्त हो जाते हैं; तो फिर शोक किस बात का?
Life Lesson (HI)
जीवन और मृत्यु प्रकृति के स्वाभाविक चक्र हैं।
Commentary (HI)
श्लोक में यह कहा गया है कि सभी प्राणियों का उत्पत्ति काल में वे अव्यक्त रूप से होते हैं, फिर धीरे-धीरे व्यक्त रूप में आते हैं, और अंत में फिर से अव्यक्त हो जाते हैं। इस संसारिक चक्रव्यूह की यह नियति है। तो इस प्रकार के संसारिक संघर्षों में संतुष्ट रहना ही ज्ञानी का लक्ष्य होना चाहिए।
इस श्लोक का अर्थ है कि जैसे जन्म और मृत्यु नियत चक्र हैं, वैसे ही हमें इस संसार के बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हमें इस चक्र के नियमों को स्वीकार कर लेना चाहिए और संतुष्ट रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों को स्वीकार करना और उनके साथ संघर्ष करने की बजाय उन्हें स्वीकार करना और सामान्य भावनाओं से ऊपर उठकर संतुष्ट रहकर जीना चाहिए। यह ज्ञानी का सही मार्ग है और उसे अंतरंत शांति और संतुष्टि प्रदान करता है।