अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥33॥
Translation (HI)
यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो अपने स्वधर्म और कीर्ति दोनों को खोकर पाप को प्राप्त होगा।
Life Lesson (HI)
कर्तव्य से विमुख होना आत्महीनता की ओर ले जाता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि वह उस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो उसे अपने स्वधर्म और कीर्ति दोनों को खोकर पाप को प्राप्त होगा। इसका अर्थ है कि जब हम अपने कर्तव्यों से मुकर जाते हैं और उन्हें नहीं निभाते हैं, तो हमारी आत्मा में अहंकार और निरादर की भावना उत्पन्न होती है। इससे हमारी आत्मा की ऊंचाई और महत्व की अहमता कम हो जाती है।
इस भावना को ध्यान में रखते हुए, हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और समझना चाहिए कि हमारे कर्म हमारे लिए केवल एक साधन हैं, जो हमें स्वधर्म की प्राप्ति और सम्मान का संचार करने में मदद करते हैं। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और उन्हें निभाने में समर्थ रहना चाहिए ताकि हम आत्महीनता और पाप से बच सकें।