Bhagavad Gita • Chapter 2 • Verse 51

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Chapter 2 • Verse 51

Sankhya Yoga

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥51॥
Translation (HI)
बुद्धियोगी ज्ञानीजन कर्मों के फलों का त्याग करते हुए जन्मबंधन से मुक्त होकर अमर पद को प्राप्त होते हैं।
Life Lesson (HI)
फलत्याग ही मोक्ष का मार्ग है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवद गीता में जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक को स्पष्ट करते हैं। यहाँ कहा गया है कि जो मनुष्य बुद्धि और ज्ञान से सम्पन्न है, वह कर्म करते समय उस कर्म के फलों को त्याग कर देता है। इस तरह कर्म करने से उसे जन्म और बंधन से मुक्ति प्राप्त होती है और वह अमर पद को प्राप्त होता है, जिसमें कोई भी रोग या दुःख नहीं होता। इस श्लोक का महत्वपूर्ण सन्देश है कि हमें फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें सिर्फ अपने कर्म करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। फल का अधिकार स्वर्ग या नरक में नहीं है, फल का अधिकार हमारे कर्मों में है। इसलिए, हमें सदैव नेक कर्म करने का प्रयास करना चाहिए और फल का भाग्य में समाहित रहना चाहिए। इसी प्रकार कर्म और फल के योग में बाधक नहीं होते हैं और हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें कर्म करते समय निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए और फल की चिंता से मुक्त होकर साधना का मार