यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥52॥
Translation (HI)
जब तेरी बुद्धि मोहजाल को भेद देगी, तब तू सुने हुए और जो सुनने योग्य है, उन सबमें विरक्ति प्राप्त कर लेगा।
Life Lesson (HI)
मोहमुक्ति विवेक का आरंभ है।
Commentary (HI)
श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जब तुम्हारी बुद्धि मोहकलिल को भेद देगी, तब तुम उस समय उस सत्य के प्रति विरक्ति प्राप्त कर लोगे जो तुमने सुना है और जिसे सुनकर तुम्हारी बुद्धि उत्तेजित हुई है।
इस भावार्थ में यह उदाहरण है कि जब हमारी बुद्धि मोह, भ्रम और अज्ञान से परिपूर्ण होती है, तो हम सच्चाई को समझने में असमर्थ होते हैं। लेकिन जब हमारी बुद्धि इस मोहकलिल से पार करके ज्ञान की दिशा में बदल जाती है, तो हम सामने आने वाले ज्ञान को स्वीकार करने लगते हैं और उसे अपनाने के लिए तैयार होते हैं। इस भावार्थ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मोहमुक्ति का मार्ग विवेक के द्वारा ही होता है। अगर हमारी बुद्धि मोह के जाल से पार कर जाती है, तो हम सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं और उसके आधार पर अपने जीवन को निर्माण करते हैं।