श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥53॥
Translation (HI)
जब तेरी बुद्धि वेदों की विविध वाणियों से विचलित नहीं होगी और स्थिर समाधि में स्थित होगी, तभी तू योग प्राप्त करेगा।
Life Lesson (HI)
स्थिर चित्त ही सच्चे योग का द्वार है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि योग का सच्चा अर्थ वह है जब उसकी बुद्धि वेदों की शिक्षाओं से प्रेरित और प्रेरणा प्राप्त होकर स्थिर और समाधान में स्थित होती है। जब एक व्यक्ति अपनी बुद्धि को वेदों और धार्मिक ग्रंथों के उच्च सिद्धांतों से परिपूर्ण बनाता है और उसे स्थिरता और समाधान में रहने की क्षमता प्राप्त होती है, तो वह व्यक्ति सच्चे योग की प्राप्ति करता है।
इस भावार्थ में यह समझाया जा रहा है कि सच्चे योग का मार्ग स्थिर चित्त में ही है। जब हमारी बुद्धि निरंतर उच्च आदर्शों और धार्मिक गुरुओं की ओर ध्यान लगाती रहती है और हम अपने मन को नियंत्रित कर के स्थिरता की स्थिति में ला देते हैं, तो हम सच्चे योग की अवस्था में पहुँचते हैं।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि योग का अर्थ बस शारीरिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें हमारी बुद्धि की स्थिरता और ध्यान है। इस श्लोक से हमें यह भी स