श्रीभगवान ने कहा: जब मनुष्य मन के समस्त कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा में संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
Life Lesson (HI)
आंतरिक संतोष ही स्थिरप्रज्ञता की निशानी है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जब एक व्यक्ति मन की सभी इच्छाओं को छोड़ देता है और अपने आत्मा में संतुष्ट रहता है, तो वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। यहाँ 'स्थितप्रज्ञ' का अर्थ है एक व्यक्ति जो अपनी चेतना को स्थिर और शांत रखता है, जो उसके आदर्श और मूल्यों में स्थिर रहता है। इसका संदेश है कि आंतरिक संतोष ही स्थिरप्रज्ञता की निशानी है। एक व्यक्ति जो अपनी आत्मा में संतुष्ट है, वह मन के उतार-चढ़ावों से परे उचित निर्णय लेता है और जीवन में स्थिरता और आनंद का अनुभव करता है।