Bhagavad Gita • Chapter 3 • Verse 30

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Chapter 3 • Verse 30

Karma Yoga

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥30॥
Translation (HI)
अपने सभी कर्मों को मुझमें अर्पित कर, आत्मबुद्धि से, आसक्ति और ममता रहित होकर, तथा मानसिक पीड़ा को त्यागकर युद्ध करो।
Life Lesson (HI)
ईश्वर अर्पण भाव से कर्म करना ही सच्चा योग है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वह सभी कर्मों को भगवान में ही समर्पित करके, आत्मबुद्धि से युक्त रहकर, आसक्ति और ममता से रहित होकर, और मानसिक पीड़ा से मुक्त होकर युद्ध करने का संदेश दे रहे हैं। इस श्लोक का मार्गदर्शन देकर भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि सच्चा योग उस समय होता है जब हम अपने सभी कर्मों को भगवान के लिए करते हैं, भगवान की इच्छा के अनुसार आचरण करते हैं, और भावनाओं में लगे रहते हैं। इस योग के माध्यम से हम आत्मा को शुद्ध और परिपूर्ण कर सकते हैं और अन्य भावों जैसे कि आसक्ति, अहंकार, और ममता को त्यागकर निःस्वार्थ कर्म करना सीखते हैं। इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि जीवन में सच्चे और उच्च योग का रहस्य ईश्वर के साथ एकता में छिपा है। इस प्रकार, यह श्लोक हमें आत्मसमर्पण और निष्काम कर्म के महत्व को समझाता है।