Bhagavad Gita • Chapter 3 • Verse 29

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Chapter 3 • Verse 29

Karma Yoga

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥29॥
Translation (HI)
गुणों से मोहित होकर अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त हो जाते हैं। पूर्ण ज्ञानी को चाहिए कि वह उन्हें विचलित न करे।
Life Lesson (HI)
धैर्य और सहिष्णुता ही सही मार्गदर्शन का आधार है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता के द्वारा गुणों और कर्मों के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं की चर्चा की गई है। यहाँ कहा गया है कि जो लोग गुणों के प्रभाव में आकर कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं, वे अज्ञानी होते हैं। इसका अर्थ है कि जब हम अपने गुणों और प्राकृतिक प्रवृत्तियों के वश में आ जाते हैं, तो हम सही और उचित निर्णय नहीं ले पाते। इसके विपरीत, एक पूर्ण ज्ञानी को चाहिए कि वह इन गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर निर्णय लेने में सक्षम हो। इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि हमें अपने गुणों और प्राकृतिक प्रवृत्तियों के वश में नहीं आना चाहिए। हमें धैर्य और सहिष्णुता बनाए रखकर सही और समझदार निर्णय लेना चाहिए। यह हमें अपनी आत्मा के महत्व को समझाता है और हमें उसे समझने के लिए उद्दीप्त करता है। इस श्लोक से हमें यह सिखाने का प्रयास किया गया है कि हमें अपने गुणों के प्रभाव से परे उठकर समझदारी से कर्म करना चाहिए। इससे हम सही और सच्चे मार्ग पर चलने क