तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥28॥
Translation (HI)
लेकिन तत्वज्ञानी यह जानकर कि गुण गुणों में ही कार्य करते हैं, आसक्त नहीं होता।
Life Lesson (HI)
ज्ञानी गुणों के खेल में स्वयं को नहीं फँसाता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति तत्वज्ञानी होता है, वह गुण और कर्म के विभाग को समझता है। उसे यह ज्ञान होता है कि गुण अपने-आप में ही कार्य करते हैं और एक दूसरे के साथ प्रभावित नहीं करते। इस प्रकार, ज्ञानी व्यक्ति स्वयं को गुणों के खेल में नहीं फँसाता है, अर्थात् वह गुणों से अलग रहता है और उनके प्रभाव में नहीं आता।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर अपने कर्मों को समझना चाहिए। हमें अपने कर्मों को गुणों के अनुसार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें गुणों से परे देखकर सही नीति और धर्म के साथ करना चाहिए। इस तरह से, हमें स्वयं को गुणों के बंधन से मुक्त रखना चाहिए और उच्च स्थान पर स्थापित करना चाहिए।