ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥31॥
Translation (HI)
जो श्रद्धापूर्वक और दोषरहित भाव से मेरी इस शिक्षाओं का पालन करते हैं, वे भी कर्मबंधन से मुक्त हो जाते हैं।
Life Lesson (HI)
श्रद्धा और निष्कपटता मुक्ति का द्वार खोलती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपना मत व्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जो मनुष्य मेरी यह नित्य शिक्षाएँ श्रद्धापूर्वक और दोषरहित भाव से अनुसरण करते हैं, वे भी अपने कर्मों से मुक्त हो जाते हैं। यहाँ 'कर्मबंधन' से मुक्ति का उल्लेख है, अर्थात् जो व्यक्ति श्रद्धा और निष्कपटता से कर्म करता है, वह कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि श्रद्धा और निष्कपटता का होना किसी भी कार्य में महत्वपूर्ण है और यह हमें मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।