ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥32॥
Translation (HI)
जो मेरी इस शिक्षा का पालन नहीं करते और दोष निकालते हैं, उन्हें सर्वज्ञानी होते हुए भी विनष्ट मानो।
Life Lesson (HI)
दोषदृष्टि स्वयं के पतन का कारण बनती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के समय अर्जुन से कह रहे हैं कि जो लोग उनकी शिक्षा का पालन नहीं करते और उनके विचारों के विरुद्ध बातें कहते हैं, उन्हें सर्वज्ञानी होते हुए भी नष्ट मानना चाहिए। उन्हें अपनी बुद्धि के दोषों से अज्ञानी मानना चाहिए।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि हमें दोषदृष्टि से दूर रहकर सच्चाई की ओर ध्यान देना चाहिए। अपनी गलतियों को स्वीकार करके सुधारना चाहिए और स्वयं के विकल्पों और अहंकार से मुक्ति पाने के लिए शास्त्रों के मार्गदर्शन का पालन करना चाहिए। इससे हम अपने जीवन में सफलता और सुख की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।