हे कौन्तेय! इस नित्य शत्रु कामरूपी अग्नि से ज्ञानी का ज्ञान ढक जाता है, जो कभी तृप्त नहीं होता।
Life Lesson (HI)
अतृप्त वासना निरंतर अशांति का कारण बनती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि ज्ञानी पुरुष का ज्ञान कामना रूपी अग्नि द्वारा ढक जाता है, जो कभी तृप्त नहीं होता। यह शत्रु हमें जीवन में उन्नति की राह में आगे बढ़ने से रोकता है। यह शत्रु हमारी अभिलाषाओं और वासनाओं के माध्यम से हमारे मन को दुष्पूर्ण करता है और हमें असंतुष्टि में डालता है। अतृप्त वासनाएँ हमें हमेशा उत्सुक और अशांति में रखती हैं, जिससे हमारा मानसिक स्थिति प्रभावित होता है। इसलिए, इस श्लोक से हमें यह सीखने को मिलता है कि हमें अपनी अतृप्त वासनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि हम शांति और संतुलन में जीवन बिता सकें।