अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥40॥
Translation (HI)
जो अज्ञानी और श्रद्धा रहित है, वह संदेहग्रस्त होता है और नष्ट हो जाता है। न इस लोक में और न परलोक में उसे सुख प्राप्त होता है।
Life Lesson (HI)
संदेह आत्मा को विनाश की ओर ले जाता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संदेहग्रस्त व्यक्ति की दुर्दशा को वर्णित कर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति को न केवल इस संसार में सुख प्राप्त होता है, न परलोक में उसे कोई भी आनंद नहीं मिलता। अज्ञानी और श्रद्धाहीन व्यक्ति संदेह में डूबा रहता है और उसका अंत विनाश की ओर होता है।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में सफलता के लिए अज्ञानता, श्रद्धाहीनता और संदेह से दूर रहना अत्यंत महत्वपूर्ण है। संदेह से भरा हुआ मन व्यक्ति को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डाल सकता है और उसे निराशा की दिशा में ले जा सकता है। इसलिए, हमें सदैव ज्ञान, श्रद्धा और निरंतर साधना के साथ आगे बढ़ना चाहिए ताकि हमारा जीवन सफलता और आनंद से भरा हो।