योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥41॥
Translation (HI)
हे धनंजय! जिसने योग द्वारा कर्मों को त्याग दिया है, जिसका संशय ज्ञान से कट गया है और जो आत्मनिष्ठ है, उसे कर्म नहीं बांधते।
Life Lesson (HI)
आत्मज्ञान के बाद व्यक्ति कर्म से बंधा नहीं रहता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति योग (साधना) के द्वारा कर्मों को त्याग देता है, उसका ज्ञान से संशय (संदेह) दूर हो गया है और जो आत्मनिष्ठ है, वह कर्मों में बंधन में नहीं फंसता। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान के लिए करता है, उसे कर्मों का फल या बंधन नहीं मिलता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जब हम आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं तो हमारे कर्मों का फल हमें नहीं लगता, और हम स्वतंत्रता से कर्म करते रहते हैं भगवान की भावना के साथ।