परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥8॥
Translation (HI)
सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर का उद्देश्य केवल विनाश नहीं, पुनर्स्थापना भी है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप के माध्यम से साधुओं की रक्षा करने और दुष्टों का विनाश करने के लिए प्रतिपन्न होने का संकेत दे रहे हैं। उनका उद्देश्य धर्म की स्थापना भी है ताकि समाज में न्याय और शांति की स्थापना हो सके। वे युग-युग में प्रकट होते हैं ताकि संसार की समग्रता की रक्षा करें और उसे उचित दिशा में ले जाएं। इस भगवद गीता के श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर का कार्य सिर्फ विनाश करना ही नहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य है समृद्धि और पुनर्स्थापना करना। इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि ईश्वर की शक्ति और दया हमें सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए है।