जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥9॥
Translation (HI)
हे अर्जुन! जो मेरे जन्म और कर्म को तत्व से जानता है, वह शरीर त्यागकर पुनर्जन्म नहीं लेता, वह मुझे प्राप्त होता है।
Life Lesson (HI)
ईश्वर को जानने से जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति उनके दिव्य जन्म और कर्म को सच्चाई से समझता है, वह समझता है कि उनकी ही दिव्य स्वरूप है। ऐसा व्यक्ति शरीर को त्यागकर फिर से जन्म-मरण का चक्र नहीं फिरता और उसका आत्मा भगवान को प्राप्त होता है।
इस श्लोक का महत्वपूर्ण संदेश है कि ईश्वर को समझने से हम संसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। जब हम अपने आत्मा को भगवान के साथ एक समझते हैं, तो हमारा जन्म-मरण का चक्र भगवान की ओर ले जाता है और हमें आत्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस भावार्थ के माध्यम से हमें यह सिखाया जाता है कि अपनी आत्मा को पहचानने और भगवान को समझने से हम संसारिक मोह और बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं और आत्मा की अद्वितीयता में आनंद और शांति का अनुभव कर सकते हैं।