विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥18॥
Translation (HI)
विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल में ज्ञानीजन समदृष्टि रखते हैं।
Life Lesson (HI)
समता ही सच्चे ज्ञान की पहचान है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल में ज्ञानीजन समदृष्टि रखते हैं। यह श्लोक हमें यह बताता है कि एक सच्चे ज्ञानी व्यक्ति किसी की अच्छाई या बुराई के आधार पर नहीं जानकर उसकी सम्माननीयता को मानता है। उसके लिए सभी जीवों में एक समानता है।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि हमें समानता और समदृष्टि का आदर्श मानना चाहिए। ज्ञानी पुरुष उन्हें जो उनके साथ हैं, उनकी सम्मान करते हैं और उन्हें उनके गुणों के आधार पर देखते हैं, न कि उनके जाति या स्थिति के आधार पर। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि वास्तव में सच्चा ज्ञान वही है जो हमें सभी जीवों में एकता की भावना सिखाता है और हमें सभी को समान दृष्टि से देखने की प्रेरणा देता है।