इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्मान्न ते ब्रह्मणि स्थिताः॥19॥
Translation (HI)
जिनका मन समभाव में स्थित है, उन्होंने इस लोक में ही सृष्टि को जीत लिया है। ब्रह्म सम और निष्कलंक है, अतः वे ब्रह्म में स्थित हैं।
Life Lesson (HI)
समदृष्टि से जीवन-मृत्यु के बंधन टूटते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि जिनका मन समभाव में स्थित है, वे लोग इस संसार में ही सृष्टि को जीत लेते हैं। उनका मन समभाव में स्थित है इसका अर्थ है कि उन्हें संतोष और उत्तम स्थिति में भी समान भाव रहते हैं। इस प्रकार, उनका मन निर्दोष और ब्रह्म सम होता है। इसलिए, ऐसे लोग ब्रह्म में स्थित होते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि समदृष्टि और समभाव से जीवन के सभी पहलुओं को स्वीकार करना चाहिए। इसे समझ कर हम जीवन के हर परिस्थिति में स्थिर रह सकते हैं और भगवान के साथ हमेशा जुड़े रह सकते हैं। इस प्रकार, यह श्लोक हमें समदृष्टि और समता की महत्वपूर्णता को समझाता है और हमें जीवन में संतुलन और सुख-शांति की प्राप्ति के लिए उपदेश देता है।