न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥20॥
Translation (HI)
जो प्रिय वस्तु प्राप्त होने पर हर्षित नहीं होता, अप्रिय मिलने पर विचलित नहीं होता, जिसकी बुद्धि स्थिर और संशयरहित है, वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित होता है।
Life Lesson (HI)
स्थिर बुद्धि ही ब्रह्मज्ञान की अवस्था है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि एक सत्वपरीक्षित योगी वह होता है जिसे प्रिय वस्तु का प्राप्त होने पर हर्ष नहीं होता और अप्रिय वस्तु का प्राप्त होने पर उसमें विचलित नहीं होता। उसकी बुद्धि स्थिर और संदेहरहित होती है, और वह ब्रह्मवेत्ता होता है जो अपने आत्मस्वरूप में स्थित है।
इस श्लोक का महत्व यह है कि हमें सब प्रकार के सुख और दुःख को स्वीकार करके उनके प्रति समभाव बनाए रखना चाहिए। जो व्यक्ति स्थिर बुद्धि से समभाव बनाए रखता है, वह ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के पथ पर होता है। इस श्लोक से हमें यह सिखाने का संदेश मिलता है कि हमें स्थिरता और संयम के साथ हर परिस्थिति का सामना करना चाहिए और अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहना चाहिए।