शनैः शनै_ruparamेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥25॥
Translation (HI)
धीरे-धीरे, दृढ़ बुद्धि के द्वारा, मन को आत्मा में स्थित करके, फिर कुछ भी अन्य नहीं सोचना चाहिए।
Life Lesson (HI)
मन को स्थिर करने की प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण हमें धीरे-धीरे और धृढ़ बुद्धि के साथ अपने मन को अपनी आत्मा में स्थिर करने की विधि बता रहे हैं। यह कहता है कि हमें अपने मन को संयमित और स्थिर रखना चाहिए, ताकि हम अपनी आत्मा को पहचान सकें और अपनी अंतरात्मा के साथ जुड़ सकें। इस प्रकार, हमें अन्य किसी भी चिंता या भ्रांति में न पड़ने की सलाह दी जाती है।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि मन को शांत और स्थिर रखने के लिए हमें धीरे-धीरे अभ्यास करना चाहिए। यह एक संयमित और ध्यान से भरपूर प्रक्रिया है जिससे हम अपने आत्मा की पहचान कर सकते हैं और अपने स्वभाव को समझ सकते हैं। इस भावना के साथ हमें किसी भी प्रकार की अन्याय या अशांति की चिंता नहीं करनी चाहिए।
इस श्लोक का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें अपने मन को नियंत्रित करने की कला को सीखना चाहिए और अपनी आत्मा की पहचान करना चाहिए। इस प्रकार, हम अपने जीवन में शांति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए योग्य बन सकते हैं।