सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥9॥
Translation (HI)
जो सुहृद, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में भी समदृष्टि रखता है — वह श्रेष्ठ योगी है।
Life Lesson (HI)
समदृष्टि ही योग की सर्वोच्च पहचान है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह सिखाते हैं कि एक व्यक्ति जो सभी प्राणियों में समान दृष्टि रखता है, चाहे वे सुहृद, मित्र, शत्रु, तटस्थ (निष्क्रिय दर्शक), मध्यस्थ (उपेक्षक), द्वेषी, बंधु, सज्जन अथवा पापी हों, उस व्यक्ति को श्रेष्ठ योगी माना जाता है। यहाँ यह बताया गया है कि एक सच्चा योगी विश्व में समानता और समरसता का आदर्श बनाए रखता है। समदृष्टि वाला व्यक्ति सभी प्राणियों को एक समान नजरिये से देखता है और उन्हें समान भावना से समझता है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सभी प्राणियों के प्रति समान भावना और सहानुभूति रखनी चाहिए। इस प्रकार की समदृष्टि हमें योग के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायक होती है।