चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥16॥
Translation (HI)
हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्य आत्मा वाले व्यक्ति मेरी भक्ति करते हैं — आर्त (दुखी), जिज्ञासु, अर्थार्थी (सांसारिक लाभ चाहने वाला) और ज्ञानी।
Life Lesson (HI)
हर भक्त का मार्ग भले अलग हो, पर लक्ष्य एक है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि चार प्रकार के लोग भगवान की भक्ति करते हैं। पहला प्रकार है आर्त, जो जो दुःख में होते हैं और भगवान की शरण में आते हैं। दूसरा प्रकार है जिज्ञासु, जो ज्ञान की खोज में लगे होते हैं। तीसरा प्रकार है अर्थार्थी, जो संसारिक लाभ की इच्छा रखते हैं और चौथा प्रकार है ज्ञानी, जो अनंत ज्ञान की खोज में लगे होते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि भगवान की भक्ति करने के लिए व्यक्ति के प्रकृति या आवश्यकताएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, परन्तु मार्ग एक ही होता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि भगवान की भक्ति में सच्चाई और ईमानदारी सर्वोपरि होती है। चाहे हमारा मार्ग जो भी हो, श्रद्धा और प्रेम के साथ भगवान की शरण में चलना हमें उसके पास ले जाएगा।