Bhagavad Gita • Chapter 7 • Verse 18

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Chapter 7 • Verse 18

Jnana–Vijnana Yoga

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥18॥
Translation (HI)
ये सभी उदार हैं, लेकिन ज्ञानी तो मेरी आत्मा के समान है — वह मुझमें स्थित है और मेरी परम गति को प्राप्त है।
Life Lesson (HI)
ज्ञानवान ईश्वर में ही स्थित रहता है — वह आत्मरूप है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण विभिन्न प्रकार के लोगों की उदारता का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि सभी लोग उदार होते हैं, लेकिन ज्ञानी पुरुष वास्तव में ईश्वर की तत्त्वज्ञानी आत्मा के समान होते हैं। वे ईश्वर में ही स्थित रहते हैं और उन्हें ईश्वर की सर्वोच्च गति को प्राप्त होते हैं। इस श्लोक का जीवन संदेश है कि ज्ञानी व्यक्ति ईश्वर में स्थित रहता है और वह अपने आत्मा में भगवान का आवास देखता है। उसकी सोच और कार्यक्षमता भी ईश्वर के साथ मिली-जुली होती है। इसके माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में भी शांति और सुख का आनंद अनुभव कर सकता है, क्योंकि वह भगवान में स्थित रहता है।