हे पार्थ! इन मार्गों को जानकर कोई योगी मोह को प्राप्त नहीं होता — अतः तुम सदा योगयुक्त बनो।
Life Lesson (HI)
ज्ञान से मोह दूर होता है और साधना स्थिर बनती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो योगी इन अद्वितीय मार्गों को जान लेता है, वह मोह में नहीं पड़ता। इसलिए अर्जुन, तुम हमेशा योग से युक्त रहो।
इस श्लोक का मूल अर्थ है कि जिस योगी ने अपने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, उसका मोह दूर हो गया है। उसे संग्यान का अनुभव हो गया है और वह सदैव योग से जुड़ा रहता है। इसका यह मतलब है कि ज्ञान के माध्यम से हम मोह से मुक्त होते हैं और हमारी साधना में स्थिरता आती है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई गई है कि ज्ञान और योग के माध्यम से हम मोह और अज्ञान से परे होकर अपने आत्मा की साक्षात्कार की ओर अग्रसर हो सकते हैं।