हे कौन्तेय! कल्पांत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं और कल्पारंभ में मैं उन्हें पुनः उत्पन्न करता हूँ।
Life Lesson (HI)
संपूर्ण सृष्टि ईश्वर की इच्छा से ही बार-बार प्रकट होती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के स्वरूप के रूप में अपनी अद्वितीय शक्ति के माध्यम से सृष्टि की रचना और संहार करने की विस्तार और समाप्ति की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह बताया है कि सभी प्राणी भगवान की प्रकृति में स्थित होते हैं और कल्प के समाप्त होने पर फिर से उन्हें सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न किया जाता है। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि संसार का प्रवाह ईश्वर की अद्वितीय शक्ति के अधीन है और सृष्टि का चक्र निरंतर चलता रहता है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें ईश्वर की उपासना और भक्ति में लगना चाहिए ताकि हम उसकी कृपा को प्राप्त कर सकें और उसके आदेशों के अनुसार जीवन जी सकें।