Bhagavad Gita • Chapter 9 • Verse 8

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Chapter 9 • Verse 8

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥8॥
Translation (HI)
मैं अपनी प्रकृति को अधीन कर बार-बार इस समस्त प्राणियों की सृष्टि करता हूँ — ये प्रकृति के वश में रहते हैं।
Life Lesson (HI)
प्रकृति के अधीन होकर जीव जन्म-मरण में बंधा रहता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी महिमा और शक्ति का वर्णन कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि वे समस्त प्राणियों की सृष्टि करते हैं और उन्हें प्रकृति के वश में रखते हैं। यहां 'प्रकृति' का अर्थ है प्राकृतिक शक्ति या माया जिससे सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अपनी अद्वितीय शक्ति और उसके अधीन रहने की उच्चता को दर्शाते हैं। इस भव्य श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि सम्पूर्ण सृष्टि भगवान की आत्मा के अद्वितीय शक्ति के अधीन है और हर जीव उसकी प्रकृति के अधीन है। हमें यह जानकर भगवान की महिमा का अद्भुत अनुभव होता है और हमें उसकी भक्ति में लिप्त होना चाहिए। इस श्लोक से हमें यह भी समझने को मिलता है कि हम सबकुछ प्रकृति के अधीन हैं और अपने आप को उसके नियमों और विधियों के अनुसार जीना चाहिए।