न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥9॥
Translation (HI)
हे धनञ्जय! ये कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं इन कर्मों में तटस्थ और आसक्तिरहित रहता हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर सबमें रहते हुए भी कर्म के बंधन से मुक्त हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उन्हें कर्मों के बंधन में नहीं फँसाते, क्योंकि वे उन कर्मों में उदासीन और आसक्तिरहित रहते हैं। भगवान के इस विशेष अवस्था को धनञ्जय अर्जुन को समझाने के लिए कह रहे हैं। यह श्लोक बताता है कि भगवान कर्मों में सकारात्मक और नकारात्मक स्थिति से परे हैं और उन्हें किसी भी कर्म के फल से आसक्ति नहीं होती। इसका संदेश है कि ईश्वर सभी में हैं और उन्हें कर्मों के बंधन से मुक्त रहना चाहिए। यह श्लोक आत्मा की अद्वितीयता और ईश्वर के साथ मिलन की अद्वितीयता को दर्शाता है।