गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥30॥
Translation (HI)
गाण्डीव धनुष हाथ से गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मैं खड़ा नहीं रह पा रहा और मेरा मन भ्रमित हो रहा है।
Life Lesson (HI)
जब मन अनियंत्रित हो जाए, तब बुद्धि भी कार्य करना छोड़ देती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान अर्जुन अपनी आत्मा के साथ अपने मन और इंद्रियों के अत्याधुनिक युद्ध गाण्डीव धनुष को छोड़कर विराजमान हैं। उनकी हाथों से धनुष गिर रहा है और त्वचा जल रही है. अर्जुन कहते हैं कि वे इस सांसारिक महायुद्ध में न तो खड़े रह सकते हैं और न ही अपने मन को नियंत्रित कर पा रहे हैं।
इस भावात्मक श्लोक के माध्यम से हमें यह समझने को मिलता है कि अर्जुन का मन विचलित हो गया है और उसने अपने कर्तव्य का त्याग कर दिया है। यह भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को उसके दायित्व को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने का कारण बनता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि मन का नियंत्रण रखना कितना महत्वपूर्ण है। जब हमारा मन अनियंत्रित हो जाता है, तो हमारी बुद्धि भी कार्य करना छोड़ देती है और हम अपने कर्तव्यों से पलायन करने की प्रवृत्ति में चले जाते हैं। इसलिए, यह श्लोक हमें मन का संयम रखने और बुद्धि के सहयोग से अपने कर्तव्यों का पालन करने की महत्वपूर्ण