यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥38॥
Translation (HI)
भले ही ये लोग लोभ से अंधे होकर कुलविनाश और मित्रद्रोह का दोष नहीं देख पा रहे हैं।
Life Lesson (HI)
धर्मच्युत लोगों के कर्म हमें भी अधर्म की ओर ना ले जाएं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बता रहे हैं कि कुछ लोग लोभ से मोहित होकर न सिर्फ कुल का नाश कर रहे हैं बल्कि मित्रों के प्रति विश्वास भी तोड़ रहे हैं, पर वे अपने इस दोष को नहीं देख पा रहे हैं।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि हमें चाहे जैसी भी परिस्थितियों में हो, हमें धर्म का पालन करना चाहिए और दूसरों के प्रति सहानुभूति और समर्थन बनाए रखना चाहिए। हमें लोभ और द्वेष से परे रहकर सच्चे मित्रता और समर्पण के माध्यम से समाज में एकता और समरसता बनाए रखना चाहिए।