Bhagavad Gita • Chapter 11 • Verse 41

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Chapter 11 • Verse 41

Vishvarupa Darshana Yoga

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥41॥
Translation (HI)
जो कुछ मैंने आपको 'हे कृष्ण',हे यादव', 'हे सखे' कहकर किया — अनजाने में, प्रमादवश या प्रेमवश — वह सब मैं क्षमा चाहता हूँ।
Life Lesson (HI)
सच्चा भक्त अपनी भूलों को पहचानकर क्षमा माँगता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उन्होंने किसी अनजाने, प्रमाद या प्रेम के कारण जो कुछ भी अच्छा या बुरा किया हो, उसके लिए क्षमा चाहते हैं। यह श्लोक दर्शाता है कि भगवान उसके भक्तों का उदाहरण देते हैं जो अपनी भूलों को स्वीकार करते हैं और क्षमा माँगते हैं। इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपनी गलतियों को मानना चाहिए और क्षमा की मांग करनी चाहिए। इससे हमारे जीवन में सहनशीलता, मानवता और उदारता की भावना विकसित होती है।