Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 10

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Chapter 13 • Verse 10

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वं इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥10॥
Translation (HI)
पुत्र, स्त्री, घर आदि में अनासक्ति, और सुख-दुख दोनों में समचित्तता — यह ज्ञान के लक्षण हैं।
Life Lesson (HI)
जो समभाव में जीता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि एक सच्चा ज्ञानी वह होता है जो पुत्र, स्त्री, और घर आदि में आसक्त नहीं है। उसे सुख और दुःख में समानभाव से रहना चाहिए। उसे चाहे वह इच्छित वस्तु प्राप्त हो या न हो, उसके मन में एक समानभाव होना चाहिए। इस श्लोक का महत्व है कि हमें संग और आसक्ति से दूर रहकर जीवन में समानभाव और संतुलन बनाए रखना चाहिए। यह हमें ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है और हमें आत्मा की उच्च स्थिति तक पहुंचाता है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि अनासक्ति और समानभाव वाले जीवन को जीना हमें सच्चे ज्ञानी बनाता है।