Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 11

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Chapter 13 • Verse 11

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यमिच्छिनी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिस्तजनसंसदि॥11॥
Translation (HI)
मुझमें अनन्य भक्ति, एकांतप्रियता और जनसमूह में अरुचि — ये भी ज्ञान के लक्षण हैं।
Life Lesson (HI)
ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, भीतर की ओर जाने की प्रेरणा देता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति मुझमें अनन्य भक्ति रखता है, उसके लिए मेरे प्रति सच्ची प्रेम की भावना होती है। वह चाहे जितना भी विषयों में इतराया हो, उसका मन हमेशा मुझमें ही लगा रहता है। उसे एकांतप्रियता की प्रवृत्ति होती है, अर्थात् वह अकेले होकर भगवान का समर्पण करता है। उसे भगवान की सेवा करने के लिए विविक्त और पवित्र स्थान पसंद होता है। वह लोगों के समूह में नहीं, बल्कि साधु-संतों के समूह में रमण करना पसंद करता है। इस श्लोक का भावार्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने सब कामों में भगवान का ध्यान और सेवा करता है, उसे भगवान के प्रति निःस्वार्थ प्रेम और एकांतप्रियता की भावना होती है। वह अपने जीवन में भगवान को महत्व देता है और साधु-संतों के संग में रहकर उनके साथ समय व्यतीत करने की प्रेरणा लेता है। इसका संदेश है कि ईश्वर के साथ अनन्य प्रेम रखना और उसकी सेवा में लगाव रखना हमें आत्मिक उन्नति और शांति की प्राप्ति म