Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 9

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Chapter 13 • Verse 9

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥9॥
Translation (HI)
इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, और जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि जैसे दुःखों का सतत विचार करना —
Life Lesson (HI)
वैराग्य और दुःखों की सच्ची समझ आत्मबोध की ओर ले जाती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवद गीता में इंद्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार की अभाव, और जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि जैसे दुःखों का सतत विचार करने की महत्वता बताते हैं। इस श्लोक में स्पष्ट है कि जब हम इंद्रियों के विषयों से वैराग्य रखते हैं, तब हमारा अहंकार कम होता है। यदि हम सच्चे दुःखों को समझते हैं जैसे जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि, तो हमें आत्मबोध की ओर ले जाने में मदद मिलती है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि इंद्रियों के विषयों से अधिक भावुक न होना चाहिए, और हमें जीवन के अनित्यता और दुःखों की सच्चाई को समझने की आवश्यकता है। इससे हम आत्मबोध की ओर बढ़ सकते हैं और आत्मा के साथ एकात्मता में जीवन का अनुभव कर सकते हैं।