Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 27

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Chapter 13 • Verse 27

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

यावन्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥27॥
Translation (HI)
हे भरतश्रेष्ठ! जो भी जड़ या चेतन उत्पन्न होता है, वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न होता है।
Life Lesson (HI)
सभी प्राणी चेतना और शरीर के संयोग से उत्पन्न होते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवान भीष्म को यह बता रहे हैं कि संसार में जो भी सत्ता - चेतन या जड़, जो भी जीवन का उद्भव होता है, वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न होता है। यहाँ 'क्षेत्र' शरीर को और 'क्षेत्रज्ञ' आत्मा को प्रतिनिधित्व करता है। इसका अर्थ है कि जीवन का सम्पूर्ण अनुभव शरीर और आत्मा के संयोग से ही संभव है। इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि हम सभी प्राणियों की चेतना और शरीर का संयोग ही उनके जीवन का मूल है। यह हमें यह बोध कराता है कि हर एक व्यक्ति का शरीर और आत्मा के मेल से ही उसका सम्पूर्ण अस्तित्व होता है और इसे समझकर हमें अपने जीवन को और भी गहराई से समझने की प्रेरणा मिलती है।