इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥13॥
Translation (HI)
‘आज मैंने यह प्राप्त किया, और आगे यह मनोकामना पूरी करूँगा; यह भी मेरा है, और और भी धन मुझे फिर मिलेगा।’ — ऐसे वे सोचते हैं।
Life Lesson (HI)
भविष्य की मृगमरीचिका में खोया मन कभी संतुष्ट नहीं होता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से यह सिखा रहे हैं कि मनुष्य कभी भी अपनी संतुष्टि के लिए जिवन में प्राप्त किये गए वस्तुओं से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। व्यक्ति जिस भविष्य की मृगमरीचिका में खो जाता है, उसे न तो वर्तमान की सुख-समृद्धि महसूस होती है और न ही भविष्य के धन-संपत्ति की प्राप्ति से उसकी तृप्ति होती है। इस श्लोक से हमें यह सीखने को मिलता है कि हमें वर्तमान को स्वीकार करते हुए संतुष्ट रहना चाहिए और भविष्य की भावनाओं में खोकर संतुष्टि की तलाश नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय, हमें संतुष्टि को वर्तमान में ही खोजना चाहिए।