हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीन अंधकारमय द्वारों से मुक्त होता है, वह आत्मा का कल्याण करता है और परम गति को प्राप्त होता है।
Life Lesson (HI)
विकारों से मुक्ति ही आत्म-कल्याण का मार्ग है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के द्वादश अध्याय का एक अहम श्लोक है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो मनुष्य इन तीन अंधकारमय द्वारों से मुक्त होता है, वह अपने आत्मा के श्रेयस्कर कार्यों का पालन करता है और उसे परम गति, यानी मोक्ष, की प्राप्ति होती है।
इन तीन अंधकारमय द्वारों का अर्थ हैं रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण की प्रभावित अवस्थाएं जो हमें अज्ञान, अहंकार और अधर्म में ले जाती हैं। इन गुणों से मुक्त होकर हम अपने आत्मा के श्रेयस्कर कार्य करते हैं, जैसे सत्य, धर्म और प्रेम के माध्यम से। इसी रूप में हम परम गति, यानी भगवान की अद्वितीय स्थिति को प्राप्त करते हैं।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि हमें अपने मन की विकारों से मुक्त होकर आत्मा के कल्याण के लिए सत्य, धर्म और प्रेम के मार्ग पर चलना चाहिए। यही मार्ग हमें परम गति, यानी मोक्ष, की प्राप्ति में सहायक होगा।