Bhagavad Gita • Chapter 17 • Verse 18

Read the shloka, translation, commentary, and tags.

Chapter 17 • Verse 18

Shraddhatraya Vibhaga Yoga

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥18॥
Translation (HI)
जो तप मान-सम्मान, पूजा और दिखावे के लिए किया जाता है — वह राजस तप कहलाता है और वह अस्थिर व क्षणिक फल वाला होता है।
Life Lesson (HI)
प्रदर्शन से प्रेरित तप आत्म-विकास नहीं देता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण राजस तप के विषय में बात कर रहे हैं। यह तप उस तप को कहते हैं जो मान-सम्मान, पूजा और दिखावे के लिए किया जाता है, जिससे किसी को दिखाने या अपनी स्थिति को बढ़ाने के लिए किया जाता है। ऐसा तप अस्थिर और क्षणिक होता है, अर्थात इसका फल अनिश्चित और अस्थायी होता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि तप केवल दिखावे और सम्मान के लिए नहीं किया जाना चाहिए। असली तप आत्म-विकास और अंतरंग उन्नति के लिए किया जाना चाहिए। इससे हमें अस्थायी और अर्थहीन संगीतों से बचने की सीख मिलती है और हम अपने जीवन में सार्थकता और स्थिरता ला सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि असली तप है जो आत्मा के उद्दीपन के लिए किया जाता है, जिससे हमारा अंतरंग उन्नति हो सके।