जो ज्ञान सभी प्राणियों में विविध और पृथक भावों को अलग-अलग रूप में देखता है — वह राजस ज्ञान है।
Life Lesson (HI)
भिन्नता को ही सत्य मानना अज्ञान का रूप है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण भगवद गीता में ज्ञान के तीन प्रकार का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों में विभिन्न और अलग-अलग भावों को अलग-अलग रूपों में देखता है, वह ज्ञान राजस है।
इस श्लोक का अर्थ है कि जब हम विभिन्न प्राणियों में भेद देखते हैं और उन्हें अलग-अलग रूपों में देखते हैं, तो हमारा ज्ञान राजसिक हो जाता है। यह ज्ञान अलगाव को सत्य मानने का परिणाम है और इसे भगवान कृष्ण अज्ञान का रूप बताते हैं।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें सभी प्राणियों में एकता और एक समानता की दृष्टि से देखना चाहिए। हमें भेदभाव को छोड़कर सबको एक समान दृष्टिकोण से देखना चाहिए ताकि हम सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकें। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह भी समझाया जाता है कि भेदभाव और अलगाव से हमें अज्ञानी बनने से बचना चाहिए और सभी प्राणियों में दिव्यता को देखना चाहिए।