तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥77॥
Translation (HI)
हे राजन्! हरि का वह अत्यंत अद्भुत रूप जब-जब स्मरण करता हूँ, तब-तब मैं विस्मय और हर्ष से भर जाता हूँ।
Life Lesson (HI)
भगवान के विराट स्वरूप का स्मरण आत्मा को रोमांचित कर देता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जब-जब उन्होंने अपने विराट स्वरूप का स्मरण किया है, तो वे हर बार अत्यंत अद्भुत और अद्वितीय रूप में प्रकट होते हैं। जब भगवान के इस महान विराट स्वरूप का स्मरण होता है, तो अर्जुन को आश्चर्य और हर्ष का अनुभव होता है। इस स्मरण से भक्त का मन उत्साहित हो जाता है और उसे भगवान के प्रति और उसके अनंत शक्ति और कृपा के प्रति अधिक श्रद्धा होती है। इस श्लोक में यह संदेश दिया जा रहा है कि भगवान के उपासना और स्मरण से हमारी आत्मा को उत्साहित करना चाहिए और हमें उसके अद्वितीय स्वरूप का सम्मान करना चाहिए। इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा और हम अपने जीवन में भगवान की उपस्थिति को अनुभव करेंगे।