अर्जुन उवाच । कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥4॥
Translation (HI)
अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय गुरुओं पर बाण कैसे चला सकता हूँ?
Life Lesson (HI)
सम्मान और कर्तव्य में द्वंद्व उत्पन्न होना स्वाभाविक है; निर्णय विवेक से होना चाहिए।
Commentary (HI)
श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछ रहे हैं कि कैसे वे युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे गुरुओं पर बाण चला सकते हैं जिन्हें उन्होंने सम्मान के पात्र समझा है। अर्जुन का इस संदेश से यह अभिप्राय है कि कर्तव्य और सम्मान के बीच एक द्वंद्व उत्पन्न होता है और व्यक्ति को विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सम्मान और कर्तव्य के मध्य संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है और हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए निर्णय और विवेक से कार्रवाई करनी चाहिए। इसके माध्यम से हमें यह भी सिखाई जाती है कि कभी-कभी हमें सख्ये और सम्मान के बीच चुनौती का सामना करना पड़ सकता है और ऐसे समय में सही निर्णय लेना आवश्यक होता है।