Bhagavad Gita • Chapter 2 • Verse 5

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Chapter 2 • Verse 5

Sankhya Yoga

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान्॥5॥
Translation (HI)
गुरुओं को न मारकर इस संसार में भिक्षा मांगकर जीवित रहना बेहतर है। यदि हम उनका वध करते हैं, तो उनका रक्तरंजित भोग ही हमें प्राप्त होगा।
Life Lesson (HI)
अन्यायपूर्वक अर्जित सुख अंततः क्लेश ही लाता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि गुरुओं को न जीवित होने के लिए मारना चाहिए, बल्कि उनसे भिक्षा लेकर जीवित रहना चाहिए। अगर हम उनका हत्या करते हैं तो हमें उनके रक्त से रंजित सुख ही प्राप्त होगा। इसका अर्थ है कि हमें अन्याय से अर्जित सुख का आनंद नहीं मिलता है, बल्कि उसका परिणाम हमें केवल दुःख ही देता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि अन्याय करने से हमारा अंततः हानि होती है और हमें दुःख ही प्राप्त होता है। इसलिए न्यायपूर्वक जीवन जीना हमें सुख और शांति की दिशा में ले जाता है।