Bhagavad Gita • Chapter 5 • Verse 15

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Chapter 5 • Verse 15

Karma Sannyasa Yoga

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥15॥
Translation (HI)
विभु (ईश्वर) किसी का पाप या पुण्य नहीं लेता। परन्तु ज्ञान अज्ञान से ढक जाता है, जिससे प्राणी भ्रमित हो जाते हैं।
Life Lesson (HI)
अज्ञान ही पाप-पुण्य की भ्रांति का कारण है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि ईश्वर (विभु) किसी भी पुण्य या पाप को लेने-देने में नहीं हैं। वे निष्काम हैं और उन्हें किसी भी कर्म के फल का आधार मानने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, ज्ञान अज्ञान से ढक जाता है, जिससे मनुष्य भ्रमित हो जाते हैं। अर्थात्, अज्ञान या अध्यात्मिक अज्ञान ही हमें सत्य से अलग कर देता है और हमें भ्रमित कर देता है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि पाप और पुण्य का चिन्हन करने के लिए हमें ज्ञान की आवश्यकता है। अज्ञान के कारण ही हम गलत निर्णय लेते हैं और भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए, ज्ञान और सत्य के मार्ग पर चलना हमें सही निर्णय लेने में मदद करता है और हमें मोक्ष की दिशा में ले जाता है। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझाया जाता है कि अज्ञान ही हमें सत्य से दूर ले जाता है और ज्ञान के द्वारा हम सही राह पर चल सकते हैं। इसलिए, ज्ञान प्राप्ति हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।