Bhagavad Gita • Chapter 5 • Verse 25

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Chapter 5 • Verse 25

Karma Sannyasa Yoga

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं ऋषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥25॥
Translation (HI)
जिन ऋषियों के पाप नष्ट हो चुके हैं, जिनकी द्वैत बुद्धि छिन्न हो चुकी है, और जो आत्म-नियंत्रित होकर सभी प्राणियों के हित में रत रहते हैं — वे ब्रह्मनिरवान को प्राप्त करते हैं।
Life Lesson (HI)
सर्वहित ही आत्महित है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण वेदों के अनुसार शिक्षा देते हैं कि जो ऋषियों ने अपने पापों का नाश कर दिया है, जिनकी द्वैत विचारना या भेदभाव दूर हो गई है और जो आत्मा को नियंत्रित करके सभी प्राणियों के हित में रमते हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करते हैं। इस भावना का अर्थ है कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, उन्हें सच्ची आत्मानंद और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सभी प्राणियों के हित में रत रहना चाहिए और द्वैत भावना से परे जाकर सबको एक समान दृष्टिकोण से देखना चाहिए। इससे हमारी आत्मा में शुद्धि होती है और हम ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति कर सकते हैं। इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि सभी प्राणियों के हित में कार्य करने से ही हम असली सुख और शांति को प्राप्त कर सकते हैं।