येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥28॥
Translation (HI)
जिनके पाप समाप्त हो गए हैं और जिन्होंने पुण्य कर्म किए हैं, वे द्वंद्वों से मुक्त होकर दृढ़ संकल्प से मेरी भक्ति करते हैं।
Life Lesson (HI)
पवित्रता और निष्ठा से ही ईश्वर की भक्ति संभव है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि जो लोग पुण्य कर्म करके अपने पापों से मुक्त हो गए हैं, वे द्वंद्वों से रहित होकर मेरी भक्ति में निष्ठा से लगे रहते हैं। इसका अर्थ है कि जब हम अच्छे कर्म करते हैं और बुराइयों से परेशानी उठाते हैं, तो हम परमात्मा की ओर से निकटता प्राप्त करते हैं। द्वंद्वों से मुक्ति का अर्थ है कि हम उन विवादित प्रापंचिक भोगों में नहीं फंसे रहते हैं और अपने मन को ईश्वर की ओर ध्यानित रखते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन में पवित्रता और निष्ठा के साथ कर्म करना हमें भगवान् की ओर ले जाता है। इसके माध्यम से हमें यह समझने को मिलता है कि भगवान् की सेवा में निष्ठा और समर्पण हमें आत्मिक शांति और उच्च स्थिति की प्राप्ति में मदद करती है।