प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्यमेव च। भयाभयं च बन्धं मोक्षं च या वेत्ति सा बुद्धिः सात्त्विकी॥30॥
Translation (HI)
जो बुद्धि यह जानती है कि क्या करना है और क्या नहीं, क्या उचित है और क्या अनुचित, क्या भय है और क्या निर्भयता, क्या बंधन है और क्या मोक्ष — वह सात्त्विक बुद्धि है।
Life Lesson (HI)
सही और गलत में भेद कर सकने वाली बुद्धि ही प्रकाश देती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण गीता में सात्त्विक बुद्धि की महत्वपूर्णता पर विचार कर रहे हैं। यहाँ उन्होंने बताया है कि जो व्यक्ति यह समझता है कि किस कर्म को करना चाहिए और किसे नहीं, क्या ठीक है और क्या गलत, क्या डर है और क्या निर्भयता, क्या बंधन है और क्या मोक्ष, वह सात्त्विक बुद्धि वाला है।
इस बुद्धि का मतलब है कि व्यक्ति सही और गलत के बीच भेद कर सकता है, उचित और अनुचित की पहचान कर सकता है और उसे भय और निर्भयता का अंतर भी समझ में आता है। इस बुद्धि के साथ एक व्यक्ति अपने कर्मों को सही दिशा में ले जाता है और सही निर्णय लेने में सक्षम होता है। इस श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि सही और गलत के बीच विवेकपूर्ण निर्णय लेना हमारे जीवन में महत्वपूर्ण है और हमें सही मार्ग पर चलने में मदद करता है।