जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
Meaning (HI)
हनुमान जी की जय हो—वे ज्ञान और गुणों के सागर हैं। कपीश्वर हनुमान जी की जय हो, जिनकी कीर्ति तीनों लोकों में उजागर है।
Vedanta Explanation (HI)
यह चौपाई “स्तुति” के रूप में शुरू होकर वेदान्त की एक गहरी बात बताती है: जिस गुण-सम्पदा को हम बाहर पूजते हैं, वही गुण भीतर भी जगाए जा सकते हैं। “ज्ञान-गुन-सागर” कहकर हनुमान जी को केवल शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि विवेक और शील का आदर्श बनाया गया है। वेदान्त में ज्ञान का अर्थ सूचना नहीं; वह स्पष्ट देखना है—क्या स्थायी है और क्या क्षणिक। जब मन राग-द्वेष से मुक्त होता है, तब यह ज्ञान सहज चमकता है।
“कपीस” (कपीश्वर) का संकेत नेतृत्व/अधिपत्य की ओर है—पर वेदान्त में सर्वोच्च नेतृत्व पहले अपने भीतर होता है: इन्द्रियों और मन पर संयम। हनुमान जी की भक्ति में यह संयम स्वाभाविक दिखता है—वे शक्ति के बावजूद विनम्र हैं, और लक्ष्य के बावजूद अहंकार-रहित।
“तिहुँ लोक उजागर” को वेदान्त में तीन अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्त—के रूपक की तरह भी समझा जा सकता है। आदर्श भक्ति/ज्ञान ऐसा हो कि हर अवस्था में स्मरण बना रहे: काम करते हुए भी, सोचते हुए भी, और विश्राम में भी। जब स्मरण स्थिर होता है, तो चित्त शुद्ध होता है और “साक्षीभाव” (witness consciousness) दृढ़ होता है।
इस चौपाई का व्यावहारिक संदेश: ज्ञान + गुण + अनुशासन—इन तीनों के साथ भक्ति को जोड़ो। तब जीवन में शक्ति भी आती है और दिशा भी; और भीतर की “असंगता” (distraction) घटकर स्थिरता बढ़ती है।