Absorption in Divine Remembrance and Inner Alignment
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
Meaning (HI)
हनुमान जी प्रभु श्रीराम के चरित्र को सुनने में अत्यंत रस लेने वाले हैं। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सदा उनके हृदय में निवास करते हैं।
Vedanta Explanation (HI)
यह चौपाई भक्ति और वेदान्त के सूक्ष्म रहस्य को प्रकट करती है—ईश्वर का “सुनना” और ईश्वर में “बस जाना।” “रसिया” शब्द केवल आनंद नहीं, बल्कि चित्त की पूर्ण तल्लीनता को दर्शाता है। वेदान्त में श्रवण (सत्य को सुनना) प्रथम साधन है। जब श्रवण रसपूर्ण हो जाता है, तब ज्ञान बोझ नहीं रहता, वह साधक के भीतर उतरने लगता है।
“प्रभु चरित्र” बाहरी कथा मात्र नहीं है। वेदान्त में ईश्वर के गुण और लीला मन के आदर्श स्वरूप को प्रकट करते हैं। राम का चरित्र—मर्यादा, सत्य, करुणा और धर्म—मन के भीतर संस्कार बनकर उतरता है। हनुमान जी इन्हें केवल सुनते नहीं, जीते हैं।
“राम लखन सीता मन बसिया” गहन प्रतीक है। राम चेतना का प्रतीक हैं—साक्षी आत्मा। लक्ष्मण अनुशासन और सेवा-भाव का रूप हैं। सीता श्रद्धा और पवित्रता का संकेत हैं। जब ये तीनों मन में बस जाते हैं, तब मन विखंडित नहीं रहता; वह एकीकृत हो जाता है।
वेदान्त कहता है कि मन जिस विषय में बार-बार रस लेता है, वही उसका आकार बन जाता है। यदि मन संसार-कथा में रमता है, तो वह अशान्त होता है; यदि ईश्वर-कथा में रमता है, तो वही शान्ति बन जाती है। हनुमान जी का जीवन बताता है कि भक्ति का चरम रूप बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि आन्तरिक निवास है—जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण विचार नहीं, बल्कि चेतना बन जाते हैं।
यह चौपाई साधक को स्मरण कराती है कि आत्म-ज्ञान की भूमि तैयारी से बनती है। जब मन दिव्य चरित्र में रमता है, तब अहंकार स्वतः पिघलता है और चित्त ज्ञान के योग्य बनता है।